मैं मोहन गया, बिहार से हूँ। मैं नाईट डिअर काफी दिनों से पढ़ता आया हूँ लेकिन मैंने कभी कहानियाँ नहीं लिखीं, पर मैं आज आपके सामने एक सच्ची कहानी लिख रहा हूँ।
पहले मैं अपने बारे में बताने जा रहा हूँ, मेरा रंग साँवला है, कद 5’2’’ और मैं एक पैर से विकलांग हूँ, पर लण्ड 6 इन्च लम्बा 2 इन्च मोटा है और मजबूत है, उसमें तनाव भी अधिक है, मैं इसलिये यह लिख रहा हूँ कि मैं पैर से विकलांग हूँ, लण्ड से नहीं..!


बात तब की है जब मैं पश्चिम बंगाल से मैट्रिक करने के बाद अपने गाँव आया था और गया में 12वीं में पढ़ता था।
2005 के अंतिम सप्ताह में मेरे पैर का आपरेशन हुआ था और मैं 15 अगस्त तक अस्पताल में रहने के बाद मैं अपने गांव गया जहाँ मैं अपने संयुक्त-परिवार के साथ रहता हूँ।
जिनमें मेरे चाचा, चाची, एक बहन, मेरे चाचा के तीन लड़के हैं, दो शादीशुदा हैं, बड़ा लड़का अपनी बीवी के साथ पीछे वाले घर में रहता है। बीच वाला लड़का और उसकी बीवी संयुक्त परिवार में रहते हैं।
मेरे घर के चारों तरफ रुम और गलियारे हैं, उसी गलियारे में मेरा बिस्तर लगाया गया। यहाँ से मुझे बाथरूम जाने में सुविधा थी, क्योंकि आपरेशन के बाद मेरे पैरों पर प्लास्टर लगा था।
बिहार के अधिकतर घरों में आँगन के बीचों-बीच में चापकल या कुआं होता है। जहाँ पर मेरा बिस्तर लगा था वहाँ से चापकल दिखाई देता था, क्योंकि बाथरूम चारों तरफ से खुला हुआ है। मर्द घर में नहीं नहाते हैं, इसलिये कोई भी औरत नहाती है, तो घर के बाहर वाला दरवाजा बन्द कर के नहाती है।
मैं चाची के लिये बेटे समान और भाभी के लिए छोटा देवर था, तो वे मेरे सामने नहा लेती थीं। भाभी जब भी नहाती थीं, तब मैं उनको चोरी छुपे देखा करता था।
अध-खुली चूची और पेटीकोट में भीगी हुई पिछाड़ी क्या मस्त लगती थी..!
वो नहाती थीं तो बोलती थीं, “अपना मुँह उस तरफ कर लो..!”
पर मैं कभी-कभी देखता था, तो अगर देख लेती थीं तो मुस्करा देती थीं, तो मुझे डर कम लगता था। वरना क्या मेरी हिम्मत थी कि मैं उन्हें इस तरह देखूँ..!
इस सबसे मेरा लन्ड खड़ा हो जाता था, पर मैं दिन में कुछ नहीं कर सकता था। रात में जब सब सो जाते थे तब उसकी याद में नींद नहीं आती, तो सोच-सोच कर मुठ मारता था।
एक दिन भाभी बोलीं- तुम बहुत गन्दे हो अक्सर तुम्हारी पैन्ट गन्दी हो मिलती है..! क्या करते हो?
मैं डर गया और चुपचाप रहा क्योंकि मेरे सारे कपड़े भाभी ही धोती थीं। जिससे पैन्ट में लगा दाग पता चल जाता था।
मेरे पैरों में प्लास्टर होने के कारण पेशाब जाने के लिये कुछ दिनों तक किसी न किसी की सहारा लेना पड़ता था। कभी चाचा, चाची, चचेरा भाई, या भाभी और कभी माँ मदद करती थीं।
गांव में खेतों में काम अधिक होता है। मेरे चाचा टीचर हैं, जो सुबह 8 बजे स्कूल जाते हैं, पिता जी पश्चिम बंगाल में सर्विस करते हैं।

मेरी माँ के अलावा मेरा कोई भी परिवार मेरे पास उस वक्त नहीं था।
10 दिनों के बाद मेरे पैरों का दर्द कम हो गया। जिससे मैं लाठी के सहारे चलने लगा। एक बार घर पर सिवाए भाभी के कोई नहीं था।

तब मैं पेशाब के लिए लाठी के सहारे जाने लगा तो पानी के कारण फिसल गया, जिससे मैं गिर गया।
तभी अपने रुम से भाभी दौड़ कर आईं और मुझे सहारा दिया और बोलीं- मुझ से कहा होता..!
मैं बोला- मुझे आपके सामने शर्म आती है।
मैं पेशाब कर रहा था, तो भाभी दूसरी तरफ मुँह करके खड़ी थीं और उसके बाद उन्होंने मुझे बिस्तर पर लाकर छोड़ा और कहा- जब भी जाना हो, मुझे कहना… मैं लेकर चलूँगी और ‘हँस’ कर चली गईं।
अब मैं अपनी भाभी के बारे में बता रहा हूँ। उनका रंग साँवला, बड़े आकार की चूची हैं, पर मैंने कभी नापी नहीं इसलिए मैं साइज़ नहीं बता सकता। पर हाँ.. मैं कह सकता हूँ कि उसमें एक अजीब सी कशिश थी, जो किसी भी मर्द को अपनी तरफ आकर्षित कर सकती

थी। उसकी उभरी हुई पिछाड़ी क्या कयामत थी..!
फिर भी मेरा भईया दूसरी चूत के चक्कर में था। मेरा चचेरे भईया की शादी के 8 साल हो गए हैं, उनका एक लड़का है। मेरा भाई का चक्कर अपनी बड़ी भाभी से चलता है, जिसके कारण पति-पत्नी में हमेशा झगड़ा होता रहता है।
अब तो इतना बढ़ गया है कि 5 साल से दोनों में सेक्स तो दूर की बात है, बात-चीत तक नहीं होती है। इस वजह से वह हमेशा उदास रहती थीं और घर के कामों में अपने आप को बिजी रखती थीं।
कभी-कभी दोपहर में समय मिलता था, तो मेरे पास कपड़ा सिलने के लिए लेकर बैठती थीं, जिससे इधर-उधर की बात होती थीं, तो मेरा भी टाइम-पास हो जाता था और उसकी भी इसी तरह कुछ दिन बीत गए।
एक दिन काम खत्म कर के मेरे पास जब बैठीं तो मैंने पूछा- ऐसा क्या हुआ कि भईया आपसे प्यार नहीं करते?
तो भाभी कुछ गम्भीर हो गईं और रोने लगीं।
तो मैंने कहा- मुझे माफ करना..
तो कहने लगीं, “तुम क्यों माफी माँगते हो, तुमने तो कोई गलती नहीं की, पर जिसने की उसे तो कुछ नहीं है। तुमने तो मेरा दु:ख बांटना चाहा।
मैं फिर कुछ नहीं बोला, जिससे थोड़ी देर में वही बोलीं- जब नई-नई शादी हुई तो मेरे साथ खूब सोया करते थे। उसी समय का एक बेटा है। तुम्हारे भाई का चक्कर शादी से पहले बड़ी भाभी से चलता था। तुम्हारे भईया चाहते थे कि दोनों से रिश्ता रखूँ, पर मुझे मन्जूर नहीं था। मैंने इसका विरोध किया तो उन्होंने मुझे मारा, पीटा, गाली-गलौच काली.. कुलटा.. बदचलन और यहाँ तक कहा कि घर से निकल जाओ। उस वक्त से न तो मेरे साथ सोते हैं और न ही बात करते हैं। मम्मी-पापा ने बहुत समझाया, पर उस रण्डी के फेर में रहता है।

मैंने सोच लिया है अब इस घर से नहीं जाऊँगी। चाहे जो हो जाए पर…
बोल कर चुप हो गईं।
मैं भी कुछ नहीं बोला और स्कूल से छोटी बहन आ गई, बात रुक गई और वो घर के काम में लग गईं।
मैं सोचता रहा कि आखिर क्या कमी है इस माल में.. बस थोड़ी सी काली ही तो है। बड़ी-बड़ी चूचियाँ है, चौड़ी-चौड़ी पिछाड़ी है, फिर भी…!
मेरे साथ कुछ दिन में इतना खुल गईं कि सेक्स की बात भी होने लगीं मसलन ‘एमसी’ कब और कैसे आती है। कब तक रहती है, कब सेक्स करने से बच्चा रहता है कब नहीं, पर खुल कर चूत और लन्ड का नाम नहीं लेती थीं। इतना खुल गई थीं कि मुझे डर नहीं लगता था सेक्स की बात करने में।
एक दिन मेरे पास बैठीं, इस बार घर के ऊपर जाने वाली सीढ़ियों पर बैठा था। मेरे पास आकर बैठ गईं। थोड़ी देर इधर-उधर की बात हुई।
मैंने बोला- आप इतनी जवान हैं, आप का मन सेक्स के लिए नहीं करता..!
मेरे बोलते ही मेरी तरफ गुस्से से देखने लगीं और चुप हो गईं। मैं तो डर गया कि आज से मुझ से भी नहीं बोलेंगी। मैं अपने आप को कोसने लगा कि क्यों बोल दिया, हाथ आती हुआ माल चला जाएगा।
थोड़ी देर में बोलीं- चाहत किसको नहीं होती है…! हर औरत को मर्द की और मर्द को औरत की जरुरत होती है। अगला बैल जैसे चलता है पिछला भी वैसा ही चलता है (ये बिहार की कहावत है।)

एक बार जब मैं रात को सोई हुई थी तो छोटू (छोटा चचेरा भाई) मेरे कमरे में आया और मेरे शरीर से खेलने लगा और मेरा हाथ अपने वहाँ पर रखा और वह बहुत उत्तेजित था, जिससे कुछ नहीं कर पाया और कपड़े के ऊपर से रगड़ते ही उसका गिर गया और जाने लगा तो मैंने उसको कहा कि आइन्दा मेरे पास आया तो मैं हल्ला कर दूँगी, जिससे वो डर गया और दोबारा मेरे पास नहीं आया।
इस बात से मेरी आँखों में चमक आ गई और सोचने लगा कि डरने की बात नहीं है। मुझे बस इसे प्यार से राजी करना है।
मैं- उसका कैसा था।
भाभी- क्या?
मैं- नूनी और क्या..!
भाभी- धत…!
मैं- बोलो ना ..!
भाभी- अन्धेरा था.. कैसे देखती..!
मैं- पकड़ा तो था..!
भाभी- छोटा था.. और ज्यादा टाइट नहीं था।
तब मैंने कहा- मुझे भी आप की सेवा का मौका मिल सकता है? मैं बड़े प्यार से करूँगा..!
इस पर झूठी नाराजगी जताई और बोलीं- धत, ये सब करने के लिए थोड़ी ही कह रही हूँ।
मेरी जिद पर मान गईं, बोलीं- प्लास्टर कटने के बाद देखेंगे।
मैंने सोचा अभी मान गई है बाद में कहीं मुकर जाए तो।
मैंने कहा- आज..!
तो कहने लगीं- तुम्हारे पैर में तकलीफ होगी। मैंने कहा- मुझे कुछ नहीं होगा।
बोलीं- ठीक है रात में,
और जाने लगी तो मैंने कहा- अरे कहाँ जा रही हो..!
“काम करने..!”
“जाते-जाते पप्पी तो देते जाओ..!”
बोली- तुम मरवा दोगे..!
जल्दी से एक पप्पी देकर चली गई और मैं रात का इन्तजार करने लगा।
शाम को खाना बना रही थी, तो मैं उसे देख कर इशारे करता था तो मेरे पास दूध देने के बहाने से आई और बोली- इतनी बेसब्री क्यों..?

रात मैं आ रही हूँ न..!
सब खाना खा कर सो गए पर मुझे नींद नहीं आ रही थी। इन्तजार करते-करते मैंने 3 बार मुठ मार ली, पर वो नहीं आई। जब सुबह के 5 बजे थे तो मेरी चाची खेत में चली गई।
तब वह नित्य-कर्म से फारिग हो कर मेरे पास आई, बोली- चाची दरवाजे पर सो रही थीं।
उसके आते ही मेरा खड़ा हो गया, मैंने उसे चूम लिया और बोला- जल्दी से मेरा पानी निकाल दो।
मैं लेटा रहा और उसने ऊपर से ही पेटीकोट उठा कर मुझ पर चढ़ गई। मैं उसका चूचियाँ दबाने लगा। दो-चार झटके मारे थे कि मेरी

चाची ने जगाने के लिये आवाज दे दी, जिससे खड़े लण्ड पर धोखा हो गया।
मैं डर गया मेरा शरीर काँपने लगा। मैंने तो सोचा कि पहली बार में ही पकड़ा गया।
पर चाची अन्दर से आवाज दे रही थीं, जिससे जान में जान आई।
इसके बाद सुबह से शाम तक एकदम सामान्य व्यवहार रहा। जैसे कुछ हुआ ही नहीं, पर वो दो-चार झटके.. मुझे पूरी जिन्दगी याद रहे।

डर के साथ मजा का एहसास ही कुछ जुदा होता है।
अब मेरा बिस्तर सामने वाले कमरे में शिफ्ट हो गया जिससे मुझे ठण्ड ना लगे। सितम्बर के महीने में रात को हल्की ठण्ड लगने लगती है। उस कमरे से बाहरी दरवाजे तक पूरी तरह से देखा जा सकता था, पर उधर से मुझे कोई नहीं देख सकता था।
दूसरी रात भी चाची के होने से कुछ नहीं हो सका, पर अगले दिन दोपहर में चाची बाहरी दरवाजे के पास काम कर रही थीं और भाभी मुझसे बिस्तर पर बैठ कर सेक्सी-सेक्सी बातें कर रही थी और बाहर भी देख रही थी कि कोई आ ना जाए।
बातों ही बातों में मैंने मुठ मारने को कहा, तो बोली- इस वक्त कोई आ सकता है।
मैंने कहा- दो दिन से मेरा लण्ड दर्द से तड़प रहा है।
मैं हल्के-हल्के चूची दबाने लगा। एक हाथ पेटीकोट के अन्दर करके मैं बुर पर हाथ फेरने लगा। साथ में बुर की पुत्तियाँ दबा देता था।

एक अँगुली बुर के अन्दर करके आगे-पीछे करने लगा।
बोली- मुझे छोड़ दो वरना झड़ जाऊँगी और सब गड़बड़ हो जाएगी।
मैं बोला- मेरा काम करो।
तो एक हाथ से मुठ मारने लगी, कुछ मिनट में ही मेरा पानी छूट गया, जिससे भाभी का हाथ गन्दा हो गया।
बोली- पहले बताना चाहिए था न कि मेरा होने वाला है..!
मैं बोला- बर्दास्त नहीं कर पाया।
दो दिन के बाद मेरे चाचा को इलेक्शन की ड्यूटी लग गई। जिससे चाची को दलान पर रात में सोने जाना पड़ा। तब मुझे मौका मिल गया और उस रात से अगले एक सप्ताह तक हमारा रात 11 बजे का शो चलता था। सब के सो जाने के बाद भी हम दोनों को नींद नहीं आती थी। वो पूरे कपड़े नहीं खोलती थी, ऊपर से ब्लाउज खोलती थी, जिससे मैं बड़े-बड़े मम्मों का दूध पीता था।
वो मेरे ऊपर चढ़ कर चुदाई करती थी। उसने कभी भी लण्ड मुँह में नहीं लिया और न ही ज्यादा चिल्लाती थी। जैसे अन्य कहानियों में लिखा जाता है कि झट से मुँह में लण्ड लेना, चिल्लाना।
जब तक मेरे पैर का प्लास्टर नहीं कटा, तब तक वो मेरी चुदाई करती रही। चुदाई करते-करते कभी-कभी रोती थी, मेरे पूछने पर कि क्यों रोती हो, कहती कि मैं भी औरत हूँ, मुझे भी मर्द की चाहत होती थी, पर मैं किसी के साथ नहीं चुदने की इच्छा दबा कर रखे रही और तुम्हारे भईया न जाने कहाँ-कहाँ मुँह मारते फिरते हैं।
दोस्तो, मैं उसको बहुत सहजता से चोदता था, पर कभी पूरी नंगी करके नहीं चोद सका।
इस तरह 3 महीने तक जब भी मौका मिलता था, हमने चुदाई की।
आपको मेरी आपबीती कैसी लगी? मुझे अपनी पसन्द ना पसन्द जरुर बताएँ। क्या मैंने औरत की इच्छा पूरी कर के सही किया?

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